एक आंख, एक हाथ और एक पैर खो चुके महाराणा सांगा का नाम सुनकर कांपती थीं विरोधी सेनाएं, बयाना के युद्ध में उनके डर से बाबर की सेना भाग खड़ी हुई थी

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हर कि आमद ब-जहां अहले-फ़ना ख़ाहिद बूद
आं कि पायंदा व बाक़ीस्त ख़ुदा ख़ाहिद बूद!’
फ़ारसी की इन पंक्तियों का अर्थ है- ‘हरेक आदमी याद रखे कि जो कोई भी इस संसार में आता है उसका विनाश ज़रूर होता है, सिर्फ़ परमेश्वर ही ऐसा है, जिसका विनाश नहीं होता।’ यह शेर ज़हीरुद्दीन बाबर ने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए उस समय कहा था जब वे मेवाड़ के राणा सांगा की सेना से मुक़ाबला करने से घबरा रहे थे।
उन लोगों से बाबर ने आगे कहा, ‘मेरे साथियोे, क्या तुम जानते हो कि हमारे और हमारी जन्मभूमि के बीच की यात्रा में कुछ महीने लग जाते हैं? अगर हम हार जाते हैं तो हमारी क्या दशा होगी? हमें अपरिचितों और विदेशियों से जूझना है। यदि हमारी हार होती है तो हम शहीदों की तरह मरेंगे और यदि विजयी होते हैं तो समझ लो हमने पवित्र उद्देश्य हासिल कर लिया। हम ऐसी शानदार मौत से मुंह नहीं मोड़ें।’ इन शब्दों के साथ बाबर अपनी उस सेना को सम्बोधित कर रहा था, जिसने 26 अप्रैल, 1526 के दिन पानीपत के मैदान में 20 घंटे की लड़ाई में दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी की विशाल सेना को धूल चटाई थी। इससे अंदाज़ लगाया जा सकता है कि मेवाड़ के पराक्रमी राणा सांगा की ताक़त और उनके शौर्य का कितना ख़ौफ़ उस समय था।

अपने पराक्रम के लिए प्रसिद्ध मेवाड़ के राणा सांगा 1508 में मेवाड़ के उस सिंहासन पर बैठे, जिसे कभी प्रतापी महाराणा कुम्भा ने सुशोभित किया था और जिन्होंने मालवा के सुलतान को परास्त किया था। ये वही महाराणा कुम्भा थे, जिनकी यशोगाथा की साक्षी कुंभलमेर के विशाल क़िले की प्राचीरें रही हैं। देखा जाए तो राजस्थान के इतिहास में शौर्यगाथाओं की कमी नहीं है, चाहे वह बापा रावल की हो या महाराणा प्रताप की। कितनी ही बलिदानी गाथाएं वहां के महलों और क़िलों की दीवारों से प्रतिध्वनित होती हैं, चाहे वे पुरुषों के ‘साका’ की हों या स्त्रियों के ‘जौहर’ की। लेकिन रक्तपात और विश्वासघात की ऐसी घटनाओं से भी वहां के इतिहास के पन्ने भरे हैं, जिनमें बेटे ने राजसिंहासन तक पहुंचने के लिए पिता की हत्या करके रक्तरंजित मार्ग अपनाया।

संग्राम का सूर्योदय
जोधपुर के मालदेव ने अपने पिता जोधा की हत्या की थी और मेवाड़ के उदयसिंह ने अपने पिता महाराणा कुम्भा की। उदयसिंह 1468 में राजा बना। यह ज़रूर है कि पांच साल के बाद ही सरदारों ने उसे हटाकर 1473 में उसके भाई रायमल को राजा बना दिया। सिंहासन के लिए ख़ूनखराबे की यह कहानी रायमल के ज़माने में भी दोहराई गई। रायमल के 13 बेटे थे- पृथ्वीराज, जयमल और सांगा सहित अन्य।
एक दिन उपरोक्त तीनों भाइयों ने एक ज्योतिषी से पूछा कि मेवाड़ का अगला शासक कौन होगा तो जवाब मिला कि अगले शासक तो संग्रामसिंह (सांगा) होंगे। बस सांगा के दोनों बड़े भाइयों ने तलवार का वार संग्रामसिंह पर किया। संग्रामसिंह ने बचाव तो किया लेकिन उनकी एक आंख फूट गई। तभी उनके काका सूरजमल वहां आ गए और संग्रामसिंह बच गए। कुछ साल बाद जब महाराणा रायमल का निधन हुआ तो 5 मई, 1508 को सांगा मेवाड़ के महाराणा हुए।
राणा सांगा ने भारतीय इतिहास के अत्यंत गंभीर अवसर पर इतिहास के रंगमंच पर क़दम रखा था। उन्हें हिंदूपत, अर्थात हिंदुओं का प्रमुख कहा जाता था। जब सोलहवीं सदी के शुरुआती दशकों में दिल्ली के अफ़गान सुल्तान कमज़ोर हो रहे थे, राजपूताना में राणा सांगा के नेतृत्व में हिंदू राजाओं का एक विशाल संगठन उभर रहा था, जो दिल्ली में अफ़गान सत्ता को ख़त्म करके हिंदुओं की सत्ता की स्थापना करना चाहता था।
देशभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा, उदारता और शौर्य जैसे गुणों के लिए और साथ ही एक शक्तिशाली मेवाड़ रियासत के प्रमुख के रूप में भारत में राणा सांगा की अलग ही प्रतिष्ठा थी। वे मेवाड़ के सबसे महान महाराणा थे। उनके शासनकाल में मेवाड़ राज्य शक्ति और समृद्धि के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गया था। उन्हें मेवाड़ की प्रतिष्ठा का कलश माना जाता था। राणा सांगा अदम्य साहसी थे। एक भुजा, एक टांग और एक आंख खोने और कई ज़ख्म खाने के बावजूद वे महान पराक्रमी थे।

विजय पताकाएं फहराईं
जब राणा सांगा मेवाड़ की यशस्वी गद्दी के स्वामी हुए थे, उसके एक दशक बाद ही दिल्ली के सिंहासन पर सुलतान इब्राहीम लोदी बैठा। गद्दी पर बैठने के तुरंत बाद ही इब्राहीम लोदी ने मेवाड़ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला और उस पर आक्रमण किया। तीस हज़ार अश्वारोही और तीन सौ हाथी लेकर यह सेना मेवाड़ की सीमा पर पहुंची। राणा संग्रामसिंह ने इस सेना को खतौली में हराया। इसके बाद जब इब्राहीम लोदी ने फिर से अपनी सेना राणा के ख़िलाफ़ भेजी तो राणा ने धोलपुर के पास बाड़ी की लड़ाई में लोदी की सेना को हराकर बयाना तक उसका पीछा किया। इन विजयों के परिणामस्वरूप राणा संग्रामसिंह के राज्य की सीमा आगरा के पास तक पहुंच गई।
इब्राहीम लोदी का मानमर्दन करने से राणा सांगा की विजय गाथा की चर्चा सारे उत्तरी भारत में हुई। लेकिन यह गाथा यहीं ख़त्म नहीं हुई। 1519 में राणा सांगा ने गुजरात की सेना और मालवा के सुल्तान महमूद द्वितीय की संयुक्त सेना को राजस्थान के गागरौन नामक स्थान पर बुरी तरह हराया। इसमें राणा सांगा को मालवा के सिलहदी और मेदिनी राय जैसे ताक़तवर राजपूत नेताओं का सहयोग मिला।

जब युद्ध में मालवा का सुल्तान महमूद द्वितीय घायल होकर रणक्षेत्र में गिर गया तो राजपूतों ने उसे उठाकर महाराणा के पास पहुंचाया। महाराणा सम्मान के साथ उसे पालकी में बिठाकर चित्तौड़ ले आए, वहां उसका इलाज करवाया और कुछ रोज़ बाद उसे फ़ौज का ख़र्च और जड़ाऊ ताज देकर एक हज़ार राजपूतांे के साथ इज़्ज़त से उसकी राजधानी माण्डू पहुंचा दिया। उसका राज्य भी उसे वापस कर दिया। पराजित शत्रु के साथ ऐसा व्यवहार भारत के इतिहास में शायद ही कहीं देखा गया है। इस युद्ध में विजय प्राप्त करने से चंदेरी के क़िले के अलावा मालवा के अधिकांश हिस्सों पर राणा का क़ब्ज़ा हो गया। मालवा में अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद राणा सांगा ने मेदिनी राय को हिंदुओं पर लगाए जा रहे जजि़या कर को ख़त्म करने का आदेश दिया।

राजपूताने पर एकछत्र
राणा सांगा ने अपने राजनीतिक कौशल और सैन्य प्रतिभा से सभी राजपूत राज्यों को संगठित किया और उन्हें एक छतरी के नीचे ले आए। उन्होंने अपना प्रभुत्व उत्तर में सतलज नदी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक और पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में बयाना, भरतपुर तक विस्तृत कर लिया था। इस प्रकार उस ज़माने में भारत में उनका हिंदू साम्राज्य काफ़ी विस्तृत था। इतने बड़े इलाक़े में राणा सांगा के अलावा एक ही हिंदू राज्य था, दक्षिण का विजयनगर साम्राज्य जो गोदावरी से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हुआ था।
बाबर अपने संस्मरण ‘बाबरनामा’ में राणा सांगा को सबसे शक्तिशाली शासक बताता है जिसने अपनी तलवार के बल पर ऊंचा स्थान हासिल किया था। कर्नल टाड के अनुसार, उनके पास 80 हज़ार घोड़े, ऊंचे दर्जे के सात राजा, 9 राव और 104 रावल थे। 500 हाथी उनकी सेना में थे। मारवाड़ और आम्बेर उन्हें सम्मान देते थे और ग्वालियर, अजमेर, सीकरी, रायसेन, कालपी, चंदेरी, बूंदी, गागरौन, रामपुरा और आबू के राजा उन्हें अपना अधिपति मानते थे।
जब राणा सांगा की आभा से उत्तर भारत आलोकित हो रहा था, तभी भारत की उत्तरी सीमा से होकर ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर नाम का आक्रांता काबुल तक आ चुका था और पंजाब में क़दम रखकर दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी पर आक्रमण करने की योजना बना रहा था। बाबर अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में लिखता है- ‘जब मैं काबुल में था, तो मेरे पास राणा सांगा का राजदूत आया था। उसके साथ यह तय हुआ था कि राणा सांगा अपनी सेना के साथ दिल्ली की ओर चढ़ें और इधर से मैं आगरे की तरफ़ चढ़ाई करूंगा। लेकिन मैंने लोदी को जीतकर दिल्ली व आगरे पर अधिकार कर लिया, तो भी वह नहीं आया।’
उधर राणा सांगा ने बाबर पर आरोप लगाया कि उसने कालपी, धोलपुर और बयाना पर क़ब्ज़ा कर लिया, जबकि समझौते की शर्तों के अनुसार ये स्थान उन्हें मिलने चाहिए थे। हो सकता है कि राणा सांगा ने सोचा होगा कि बाबर पहले के आक्रमणकारियों की तरह माल लूटकर वापस चला जाएगा, लेकिन यह उनका भ्रम निकला। जब उन्होंने देखा कि बाबर ने तो राज करना तय कर लिया है तो इस ख़तरे से वो सचेत हो गए होंगे और फिर बाबर की सहायता करना मुनासिब नहीं समझा होगा।

खानवा की ओर
जो भी हो, बाबर ने अपनी कम सेना के बावजूद पानीपत के युद्ध में दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी की विशाल सेना को पराजित किया और दिल्ली-आगरा पर क़ब्ज़ा कर लिया। राणा सांगा जैसे वीर और महत्वाकांक्षी योद्धा ने इस विदेशी आक्रांता को देश के बाहर निकालने का संकल्प किया और सभी राजपूतों के सहयोग से एक शक्तिशाली सेना जुटाई।

राणा ने बयाना पर आक्रमण किया और वहां के गवर्नर मेहदी ख़्वाज़ा को हराकर बयाना के क़िले में बंद रहने के लिए मजबूर कर दिया। राणा के साथ बहुत-से शक्तिशाली सरदार हो लिए, जिनमें रायसेन का सिलहदी, हसन ख़ां मेवाती और इब्राहीम लोदी का भाई महमूद लोदी भी था। राणा ने मान लिया कि बाबर पर विजय हासिल करने के बाद महमूद लोदी को दिल्ली का सिंहासन सौंप दिया जाएगा। अब बाबर ने एक सैनिक टुकड़ी बयाना की सहायता के लिए भेजी, लेकिन वहां के दुर्ग रक्षकों से मुठभेड़ में बाबर की सेना क़ामयाब न हो सकी और घबराकर भाग खड़ी हुई। पराजित सैनिकों ने वापस लौटने पर राजपूूतों के शौर्य, साहस और वीरता के क़िस्से बाबर को सुनाए। इस समय तक बाबर सीकरी पहुंच चुका था, जहां राणा सांगा पहले ही खानवा के पास एक पहाड़ी तक चढ़ आए थे। खानवा वर्तमान भरतपुर राज्य का एक गांव था। यह आगरा के पश्चिम में 37 मील और सीकरी से 10 मील दूर था। बाबर ने 1,500 सैनिकों का एक दल शत्रु की स्थिति का निरीक्षण करने के लिए भेज दिया। ये भी बुरी तरह पराजित हुए और वहां से खदेड़ दिए गए। अब बाबर एक अत्यंत विषम स्थिति में पड़ गया था। उसकी सेना घबरा गई थी और राजपूतों के पराक्रम से भयभीत होने लगी थी। इसी बीच काबुल के ज्योतिषी मुहम्मद शरीफ़ ने बाबर को बताया कि मंगल का तारा सामने है, इसलिए बाबर की फ़ौज की ज़रूर हार होगी। इससे मुग़ल सेना और घबरा गई और वापस लौटने की बात करने लगी।

बाबर के लिए यह ज़रूरी हो गया था कि वह किसी तरह अपने साथियाें का साहस बढ़ाए। वो मदिरापान का बहुत शौक़ीन था लेकिन अब उसने मदिरापान छोड़ने की घोषणा करते हुए अपने अधिकारियों तथा सैन्य समूहों के सामने क़ीमती मदिरा धरती पर उड़ेल दी और मदिरा के क़ीमती पात्रों को तोड़-फोड़ डाला। इसके अलावा उसने मुसलमानों पर से तमगा नामक कर हटा दिया, जिसे मुसलमान बहुत नापसंद करते थे। इतने पर भी उसके साथियों की हिम्मत नहीं बढ़ी। इस पर उसने अपने फ़ौजी साथियों की एक सभा आयोजित की और उन्हें संबोधित करते हुए वचन दिया कि विजय के बाद जो कोई अपने घर जाना चाहेगा, उसको जाने की अनुमति दे दी जाएगी। उसने राणा सांगा के ख़िलाफ़ जिहाद तो पहले ही घोषित कर दिया था। बाबर की ये युक्तियां कारगर साबित हुईं और सैनिकों में उत्साह का संचार हुआ। इसी बीच बाबर के कुछ सैनिकों ने आगे बढ़कर राणा की सेना के कुछ भटके हुए इक्का-दुक्का लोगों पर आकमण कर दिया और उनके सिर काटकर सेना के सामने ले आए। इससे मुग़ल सेना की हिम्मत बढ़ने में और सहायता मिली।

एक निर्णायक संघर्ष
खानवा में दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने थीं। बाबर के अनुसार राजपूत सेना में क़रीब दो लाख सैनिक थे लेकिन असली लड़ाके 80 हज़ार से ज़्यादा न रहे होंगे। बाबर की सेना में अफ़गानों की कुछ हज़ार सेना तथा अन्य सेनाएं भी थीं और इस प्रकार उसकी सेना 40 हज़ार की रही होगी। बाबर ने अपनी व्यूह रचना कुछ संशोधनों के साथ पानीपत के युद्ध जैसी ही की। सामने के मोर्चे पर बिना बैल की बहुत-सी बैलगाड़ियां लोहे की जंज़ीरों से बांधकर रखी गईं। पानीपत के युद्ध के समान उन्हें चमड़े के रस्सों से नहीं बांधा गया था। बाबर अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ ख़ुद सेना के मध्य में तैनात हो गया। चिन तैमूर और खुसरू कोकल्ताश उसके दाहिनी ओर हो गए और हुमायूं ने दिलावर ख़ां और कुछ अन्य हिंदुस्तानी सरदारों को लेकर दाहिने पक्ष को सम्हाला।

बाबर के एक प्रमुख अधिकारी मेहदी ख्वाज़ा ने सेना के बाएं पक्ष का काम हाथों में लिया। सेना के पीछे दाहिनी और बाईं ओर से दुश्मन पर घेरा डालने वाले घुड़सवार दल थे। बिना बैल वाली बैलगाड़ियों की क़तार केे पीछे तोपों को एक पंक्ति में खड़ा कर दिया गया था और इसकी कमान निज़ामुद्दीन ख़लीफ़ा के हाथ में थी। बचाव के लिए लकड़ी की पहिएदार तिपाइयां बनवाई गईं और उन पर तोपें रखी गईं, जिससे उन्हें मनचाही जगह घुमाकर गोले छोड़े जा सकें। ये तिपाइयां तोपचियों के बचाव स्थल का भी काम करने वाली थीं।

पराजय का विष
जहां तक राणा सांगा की विशाल सेना का सवाल है तो उनकी सेनाएं चार प्रचलित खण्डों में विभाजित की गई थीं- अग्रगामी रक्षक, मध्य पक्ष, दाहिना पक्ष और बायां पक्ष। राणा के पास न तो तोपख़ाना था और न तेज़ी से धावा करने वाले घोड़े। 16 मार्च 1527 को प्रातः 9 बजे लड़ाई शुरू हुई। राजपूतों के लिए मुग़लों का तोपख़ाना भयंकर सिद्ध हुआ।

वे इसका अधिक समय तक सामना न कर सके और उनका साहस टूटने लगा। बाबर की सेना के पीछे स्थित तुलगमा के घुड़सवारों ने इसके बाद इस प्रकार धावा किया कि राजपूत बिखर गए। 20 घंटे चले इस भयानक युद्ध में बाबर विजयी हुआ। राणा सांगा घायल हो गए और उनके अनुगामी उन्हें बसवा नामक सुरक्षित स्थान पर ले गए। राणा सांगा के सहयोगी हसन मेवाती और अन्य प्रमुख सरदार वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन महमूद लोदी साफ़ बचकर निकल गया।

जब गंभीर रूप से घायल राणा सांगा की चेतना लौटी तो उन्हें बहुत निराशा हुई और उन्होंने ख़ुद को रणथम्भौर के महल में बंद कर लिया। एक भाट बहुत कठिनाई से राणा के पास पहुंचा। वह हिंदू पुराणों के वीरों की असफलताओं के बाद सफलताओं के जोशीले दृष्टांत प्रस्तुत करके राणा में उत्साह का संचार करने में क़ामयाब हुआ। उस समय बाबर ने खानवा से चलकर चंदेरी पर घेरा डाल रखा था।

राणा सांगा ने तय किया कि वे बाबर से मुक़ाबला करने चंदेरी रवाना होंगे। लेकिन राणा के साथी सरदार अब युद्ध के लिए तैयार नहीं थे और उन्होंने युद्ध से बचने के लिए राणा सांगा को ज़हर दे दिया। इसी ज़हर से 30 जनवरी, 1528 को राणा का निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार माण्डलगढ़ में हुआ। उधर बाबर ने राणा के निधन के एक दिन पहले ही चंदेरी के क़िले पर अधिकार कर लिया था।

महाराणा सांगा का चबूतरा, बसवा, दौसा, राजस्थान
महाराणा सांगा का चबूतरा, बसवा, दौसा, राजस्थान
अक्षुण्ण रहा गौरव
राणा सांगा का तो अंत हो गया लेकिन राजपूतों के शौर्य ने बाद में भी एकाधिक बार शत्रुओं को चुनौती दी। राजपूत कुछ साल में फिर उठ खड़े हुए और गुजरात के बहादुरशाह तथा दिल्ली के शेरशाह को उनसे मुक़ाबला करना पड़ा। जोधपुर के घेरे में तो राजपूतों ने शेरशाह से हुए युद्ध में इतनी वीरता प्रदर्शित की कि शेरशाह को लगा वह हार जाएगा और साम्राज्य उसके हाथ से निकल जाएगा। उस समय का इतिहासकार अब्बास सरवानी अपनी किताब ‘तारीख़े शेरशाही’ में लिखता है कि ऐसे समय शेरशाह के मुंह से निकला- ‘बराए एक मुश्त ए बाजरा, बादशाही हिंदुस्तान रा बरबाद ददाह बूदम’ यानी एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैंने हिंदुस्तान के साम्राज्य को संकट में डाल दिया था। यह भी उल्लेखनीय है कि राणा सांगा पर विजय हासिल करनेे के बाद भी बाबर की हिम्मत राजस्थान पर आकमण करने या बहादुर राजपूतों को नाराज़ करने की नहीं हुई।

दो गंभीर भूलें
अंत में सवाल यह बाक़ी रह जाता है कि राजपूत बहुत वीर और साहसी थे, अच्छे योद्धा भी थे और राणा सांगा बहुत पराक्रमी थे और उनकी सेना बहुत विशाल भी थी तो फिर उनकी हार क्यों हुई। अन्य कारणों के अलावा इसके दो ख़ास कारण साफ़ दिखते हैं।
एक तो यह कि रणक्षेत्र में जिस प्रकार की युद्ध-योजना बाबर ने अपनाई थी, उसके जोड़ की योजना राणा सांगा के पास नहीं थी। दूसरे, एक साल पहले पानीपत में बाबर के तोपख़ाने की उपयोगिता ज़ाहिर होने के बावजूद राणा सांगा ने तोपख़ाने की व्यवस्था करने की चिंता नहीं की। जो ग़लती तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गोरी के साथ हुए युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने की थी, वही पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोदी ने की थी और वही राणा सांगा ने खानवा में की।

आश्चर्य है कि 1192 से लेकर 1527 तक यानी 335 साल के बाद भी भारत में युद्ध क्षेत्र में सेनाओं को रखने का वही पारम्परिक तरीक़ा अपनाया गया। मध्यकाल में देश के बाहर अपनाई जा रही युद्ध-योजनाओं में, शस्त्रों में क्या बदलाव हो रहा था, इसे जानने और आज़माने की भारतीय राजाओं ने चेष्टा नहीं की।

राजपूत उच्चकोटि के वीर और साहसी सैनिक थे, लेकिन उनके सेनानायकों और स्वामियों ने उनकी वीरता का सही उपयोग नहीं किया। न उन्हें बेहतर घोड़े दिए, न उम्दा अस्त्र-शस्त्र दिए और न ही विदेशों में अपनाए जा रहे युद्ध के नए तरीक़ों और आविष्कारों का उपयोग किया। उन्होंने बहादुर राजपूतों को युद्ध में प्राणोत्सर्ग करना तो सिखाया लेकिन युद्ध जीतने के तरीक़े नहीं अपनाए। राजपूताने के बहादुर सैनिकों ने अपने शौर्य और आत्मसम्मान के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। महिलाएं भी उनसे पीछे नहीं थीं। तभी तो राजपूत वीरांगनाएं युद्धक्षेत्र में अपने पति के प्राणोत्सर्ग को उनकी पराजय से श्रेयस्कर मानते हुए डिंगल भाषा में यह कहने का साहस कर सकती थीं कि ‘भल्ला हुआ जो मारिया जो बहिणि म्हारा कंतु, लज्जेजेउ वयंशु यहु जेई भग्गा घरु एन्तु’- हे सखी, यह अच्छा ही हुआ कि मेरा पति रणक्षेत्र में मारा गया, यदि वह पराजय के बाद घर भागकर आता तो हमारा वंश लज्जित होता। ऐसी वीरप्रसूता भूमि में जन्मे योद्धाओं में शौर्य और प्राणोेत्सर्ग की भावना के अनगिनत उदाहरणों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं।

लेकिन इतिहास यह बताता है कि सिर्फ़ प्राण देने से युद्ध नहीं जीते जाते, बेहतर शस्त्र और सटीक रणनीति भी विजय हासिल करने के लिए ज़रूरी होते हैं।

लेखक परिचय

डॉ. सुरेश मिश्र
वर्ष 1937 को मण्डला (मध्यप्रदेश) में जन्म। इतिहास में एमए तथा पीएचडी। इतिहास विषयक उत्कृष्ट लेखन पर मध्यप्रदेश शासन द्वारा ‘डॉ. शंकरदयाल शर्मा सृजन सम्मान 2013’ द्वारा सम्मानित किया गया। इतिहास और संस्कृति विषयक 33 शोधपूर्ण पुस्तकों का लेखन।

साभार – दैनिक भास्कर