खेतिहर मजदूर बने रेशमी किसान,मनरेगा से लगाये गये अर्ज़ुन और साजा के पेड़ों पर कोसा उत्पादन से बदली जिंदगी, तीन साल में कमाए ढाई लाख।

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रायपुर. 4 नवम्बर 2020. मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) और रेशम विभाग के अभिसरण ने पांच ऐसे छोटे किसानों को कोसा उत्पादन का मौका दिया है जो हर साल खरीफ की फसल के बाद साल के बांकी महीनों में मजदूरी की तलाश में रहते थे। बीजापुर जिले के शासकीय कोसा बीज केंद्र, नैमेड़ में श्री आयतु कुड़ियम और उनके चार साथी अर्जुन व साजा के पेड़ों पर कोसा कीट पालन कर कोसा फल का उत्पादन और संग्रहण कर रहे हैं। इस काम से पिछले तीन वर्षों में उन्होंने ढाई लाख रूपए की कमाई की है। पांच किसानों के इस समूह द्वारा उत्पादित कोसा फल को रेशम विभाग कोकुन बैंक के माध्यम से खरीदता है। इससे सालभर उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है।
रेशम विभाग के अधिकारियों ने बताया कि शासकीय कोसा बीज केन्द्र, नैमेड़ में 12 वर्ष पहले मनरेगा के अंतर्गत करीब साढ़े तीन लाख रूपए की लागत से 28 हेक्टेयर में लगभग 16 हजार 800 साजा और इतनी ही संख्या में अर्जुन के पौधे रोपे गए थे। अब ये पौधे करीब दस फीट के पेड़ बन चुके हैं। रेशम विभाग के द्वारा इन पेड़ों पर रेशम के कीड़ों का पालन कर कोसा फल उत्पादन का कार्य करवाया जा रहा है। स्थानीय किसान और खेतिहर मजदूर श्री आयतु कुड़ियम ने वर्ष 2015 में रेशम विभाग के कर्मचारी की सलाह पर वहां मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया था। अपनी सीखने की ललक के चलते उन्होंने धीरे-धीरे वहां कोसा फल उत्पादन का प्रशिक्षण लेना भी शुरू कर दिया। सालभर में वह इसमें पूरी तरह से दक्ष हो चुका था। काम सीखने के बाद श्री कुड़ियम ने अपने साथ गांव के चार और मनरेगा श्रमिकों को जोड़कर समूह बनाया और पेड़ों के रखरखाव के साथ कीटपालन और कोसा फल उत्पादन का कार्य शुरू किया।
कुशल कीटपालक बनने के बाद कोसा फल के उत्पादन की नई आजीविका के बारे में श्री कुड़ियाम कहते हैं – “आगे बढ़ने के लिए मेरे मन में खेती-किसानी के अलावा कुछ और भी करने का मन था। रेशम कीटपालन के रूप में मुझे रोजी-रोटी का नया साधन मिला। मनरेगा से हुए वृक्षारोपण से फैली हरियाली ने मेरी जिंदगी में भी हरियाली ला दी है। कोसा फल के उत्पादन से जुड़ने के बाद अब मैं अपने परिवार का भरण-पोषण अच्छे से कर पा रहा हूं। मेरे तीन बच्चे अच्छी पढ़ाई-लिखाई कर रहे हैं।”